रीति
है बधाई देना
स्वस्थ ''राजनीति'' अब नहीं की जाती । यह स्वार्थ के लिए किया जाने लगा है। अब यह मूल्यों के लिए नहीं की जाती। नैतिकता की बात करना बेमानी है। इसमें बने रहने के लिए अब किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार होते हैं नेता। नैतिकता की बात भूल जाइए । आपमें फायदा दिखा तो आज आपके साथ और जिस क्षण पता चला कि आपसे मेरा स्वार्थ नहीं सध रहा तो नये समीकरण को अपनाने में कोई परहेज नहीं। मत कीजिए वसूलों की बातें ।
पिछले आम चुनाव के परिणाम आने के बाद यूपीए 2 बनने से पहले नीतीश ने कहा था कि जेडीयू उस सरकार का समर्थन करेगी जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने को तैयार होगा। मगर तब ऐसा कुछ हुआ नहीं। अब गुजरात चुनाव के परिणाम आने के बाद राजनीतिक पार्टियों के बीच नये समीकरण बनने लगे हैं। अगला चुनाव हो सकता है बीजेपी के साथ मिलकर जेडीयू न लड़े। बीजेपी के साथ दोस्ती निभाना शायद जेडीयू को अब घाटे का सौदा लगने लगा है। उसे नये साथी की तलाश है। कांग्रेस भी आरजेडी और एलजेपी से बेहतर जेडीयू से गठबंधन करने को फायदेमंद मानती है। इशारों में ही कांग्रेस ने जेडीयू को घास डाल दिये हैं। जेडीयू को संकेत मिल गया है ।यानी सत्ता पाने के लिए पार्टियों को अगले आम चुनाव में नये साथियों की तलाश होगी ! यानि स्वार्थ की राजनीति । देश हित की बात बाद में की जाएगी जब समय निकाल पायेंगे तब।
गुजरात में मदिरा पर निषेध है। यानी वहां मर्दों का पीना और फिर पीकर बवाल करने, अपनी स्त्री को पीटने घर में बच्चों का खयाल नहीं रखने जैसी घटनाओं के घटित होने का सवाल ही नहीं उठता । मदिरा जिससे करोड़ों का राजस्व प्राप्त होने की बात नीतीश कुमार किया करते हैं उन करोड़ों रूपयों की मोदी को परवाह नहीं। फिर भी मोदी का राज्य देश के अति विकसित राज्यों में से एक है। दूसरी तरफ मदिरा ने पिछले दिनों बिहार में सैकड़ा से भी ज्यादा लोगों की जान ले ली। शराब से कितने ही परिवार बरबाद हो रहे हैं मगर इसके बिक्री की वकालत की जा रही है। कारण इससे करोड़ों का राजस्व राज्य को प्राप्त हो रहा है। जिम्मेदार नेताओं से यह भी सुनने को मिला कि इससे प्राप्त हो रहे राजस्व से लड़कियों के स्कूल जाने के लिए साइकिल तक खरीदे जा रहे हैं। बताइए एक तरफ जहरीला शराब पीकर परिवार के मुखिया की मौत हो जा रही है , परिवार सड़क पर आ जा रहा है और दूसरी तरफ मदिरा से करोड़ों का राजस्व प्राप्त होने के कारण इसे और भी बढ़ावा दिया जा रहा है । नीतीश जी को राजस्व कमाने का कोई और विकल्प ढूंढ़ना होगा। मौत देकर राजस्व कमाना किसी को स्वीकार्य नहीं। सख्ती बरतनी होगी। बढ़ती शराब दुकानों की संख्या पर अंकुश लगाना ही होगा। इसका नौजवानों की जिंदगी पर असर पड़ रहा है। जानना होगा और अनुसरण करना होगा कि मदिरा पर निषेध लगाकर गुजरात राजस्व कैसे कमा रहा है। कैसे आगे बढ़ रहा है गुजरात। अनुसरण करने के रास्ते में अहम नहीं आना चाहिए।
जीत के बाद नरेंद्र मोदी का केशुभाई से जाकर मिलना उनका आशीर्वाद लेना उन्हें मिठाई खिलाना ... उनके हाथ से मिठाई खाना शिष्टाचार का हिस्सा है। य़ुवा वर्ग खासकर शहरों में जो मोदी को ही जानता है, जिनके वोट मोदी को ही मिले उन्हें मोदी ने अपने इस व्यवहार से शिष्टाचार का एक पाठ पढ़ा दिया। जीत के बाद भी विनम्रता बनी रहे मोदी ने देश की भावी पीढ़ी को सिखाया । साथ ही मोदी ने अपने इस व्यवहार से उनलोगों का समर्थन दोबारा पाने का प्रयास किया जो उनसे इस समय दूर हैं। आनेवाले समय में केशुभाई एक बार फिर मोदी के साथ हो लें तो इसमें ताज्जुब करने की जरूरत नहीं। इसे मोदी के रचनात्मक राजनीति की संज्ञा देनी होगी।
अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में हार के बाद भी शिष्टाचार को न भूलते हुए टिम रोमनी ने बराक ओबामा को उन्हें जीत की बधाई दी। 'विक्ट्री स्पीच' में ओबामा भी रोमनी का आभार जताने से नहीं चुके। इन बड़े नेताओं को करोड़ो लोग उन्हें रोल मोडल के रूप में देखते हैं। एक रोल मोडल द्वारा सार्वजनिक जीवन में इस तरह व्यवहार करना आम नागरिक को काफी कुछ सिखाता बताता है।उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करता है। विश्व के शीर्षस्थ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह कह कर पूरी दुनिया को शिष्टाचार का पाठ पढ़ाया ।
मोदी की तरह नीतीश कुमार की भी लोकप्रियता अपने राज्य में कम नहीं है। उन्हें चाहनेवालों की संख्या भी करोड़ में है। बिहार की युवा पीढ़ी भी नीतीश को खूब जानती मानती है। उनकी सरकार के प्रचार से तो ऐसा ही लगता है कि उन्होंने ही लड़कियों को स्कूल जाना सिखाया। उन्हें साइकिल देकर उन्होंने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। लेकिन मोदी की जीत पर मोदी को बधाई न देकर नीतीश ने युवा पीढ़ी को कैसा शिष्टाचार सिखाया। चैनलवालों के माईक लगे रहे और नीतीश खामोश रहे। मोदी को मुबारकबाद न देकर उन्होंने खुद ही अपना कद छोटा कर लिया। मोदी को आम जनता ने चुना है। जनता के मत को हम नकार नहीं सकते। नीतीश ने बिहार की युवा पीढ़ी में ऐसा आचरण कर गलत संदेश दिया। राजनीति तो अपनी जगह है । वह तो चलती रहेगी। मगर राजनीति के साथ शिष्टाचार, आचरण, नैतिकता के मूल्यों का ह्रास न हो यह भी राज्य के मुखिया को ही सुनिश्चित करना होगा। भविष्य में सत्ता संभालने वाली भावी पीढ़ी को इस समय के नेताओं यही तो सिखाना है।
अपने स्वभाव के कारण और प्राय: सारपूर्ण बयान देनेवाले नीतीश ने बिहार को प्रगति के पटरी पर गति दी है। वे राष्ट्रीय स्तर के नेता बन चुके हैं। उनकी उपलब्धि की चौतरफा प्रसंशा है। नरेंद्र मोदी की तरह भावी प्रधानमंत्री के रूप में देश उन्हें भी देखना चाहता है।
स्वस्थ ''राजनीति'' अब नहीं की जाती । यह स्वार्थ के लिए किया जाने लगा है। अब यह मूल्यों के लिए नहीं की जाती। नैतिकता की बात करना बेमानी है। इसमें बने रहने के लिए अब किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार होते हैं नेता। नैतिकता की बात भूल जाइए । आपमें फायदा दिखा तो आज आपके साथ और जिस क्षण पता चला कि आपसे मेरा स्वार्थ नहीं सध रहा तो नये समीकरण को अपनाने में कोई परहेज नहीं। मत कीजिए वसूलों की बातें ।
पिछले आम चुनाव के परिणाम आने के बाद यूपीए 2 बनने से पहले नीतीश ने कहा था कि जेडीयू उस सरकार का समर्थन करेगी जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने को तैयार होगा। मगर तब ऐसा कुछ हुआ नहीं। अब गुजरात चुनाव के परिणाम आने के बाद राजनीतिक पार्टियों के बीच नये समीकरण बनने लगे हैं। अगला चुनाव हो सकता है बीजेपी के साथ मिलकर जेडीयू न लड़े। बीजेपी के साथ दोस्ती निभाना शायद जेडीयू को अब घाटे का सौदा लगने लगा है। उसे नये साथी की तलाश है। कांग्रेस भी आरजेडी और एलजेपी से बेहतर जेडीयू से गठबंधन करने को फायदेमंद मानती है। इशारों में ही कांग्रेस ने जेडीयू को घास डाल दिये हैं। जेडीयू को संकेत मिल गया है ।यानी सत्ता पाने के लिए पार्टियों को अगले आम चुनाव में नये साथियों की तलाश होगी ! यानि स्वार्थ की राजनीति । देश हित की बात बाद में की जाएगी जब समय निकाल पायेंगे तब।
गुजरात में मदिरा पर निषेध है। यानी वहां मर्दों का पीना और फिर पीकर बवाल करने, अपनी स्त्री को पीटने घर में बच्चों का खयाल नहीं रखने जैसी घटनाओं के घटित होने का सवाल ही नहीं उठता । मदिरा जिससे करोड़ों का राजस्व प्राप्त होने की बात नीतीश कुमार किया करते हैं उन करोड़ों रूपयों की मोदी को परवाह नहीं। फिर भी मोदी का राज्य देश के अति विकसित राज्यों में से एक है। दूसरी तरफ मदिरा ने पिछले दिनों बिहार में सैकड़ा से भी ज्यादा लोगों की जान ले ली। शराब से कितने ही परिवार बरबाद हो रहे हैं मगर इसके बिक्री की वकालत की जा रही है। कारण इससे करोड़ों का राजस्व राज्य को प्राप्त हो रहा है। जिम्मेदार नेताओं से यह भी सुनने को मिला कि इससे प्राप्त हो रहे राजस्व से लड़कियों के स्कूल जाने के लिए साइकिल तक खरीदे जा रहे हैं। बताइए एक तरफ जहरीला शराब पीकर परिवार के मुखिया की मौत हो जा रही है , परिवार सड़क पर आ जा रहा है और दूसरी तरफ मदिरा से करोड़ों का राजस्व प्राप्त होने के कारण इसे और भी बढ़ावा दिया जा रहा है । नीतीश जी को राजस्व कमाने का कोई और विकल्प ढूंढ़ना होगा। मौत देकर राजस्व कमाना किसी को स्वीकार्य नहीं। सख्ती बरतनी होगी। बढ़ती शराब दुकानों की संख्या पर अंकुश लगाना ही होगा। इसका नौजवानों की जिंदगी पर असर पड़ रहा है। जानना होगा और अनुसरण करना होगा कि मदिरा पर निषेध लगाकर गुजरात राजस्व कैसे कमा रहा है। कैसे आगे बढ़ रहा है गुजरात। अनुसरण करने के रास्ते में अहम नहीं आना चाहिए।
जीत के बाद नरेंद्र मोदी का केशुभाई से जाकर मिलना उनका आशीर्वाद लेना उन्हें मिठाई खिलाना ... उनके हाथ से मिठाई खाना शिष्टाचार का हिस्सा है। य़ुवा वर्ग खासकर शहरों में जो मोदी को ही जानता है, जिनके वोट मोदी को ही मिले उन्हें मोदी ने अपने इस व्यवहार से शिष्टाचार का एक पाठ पढ़ा दिया। जीत के बाद भी विनम्रता बनी रहे मोदी ने देश की भावी पीढ़ी को सिखाया । साथ ही मोदी ने अपने इस व्यवहार से उनलोगों का समर्थन दोबारा पाने का प्रयास किया जो उनसे इस समय दूर हैं। आनेवाले समय में केशुभाई एक बार फिर मोदी के साथ हो लें तो इसमें ताज्जुब करने की जरूरत नहीं। इसे मोदी के रचनात्मक राजनीति की संज्ञा देनी होगी।
अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में हार के बाद भी शिष्टाचार को न भूलते हुए टिम रोमनी ने बराक ओबामा को उन्हें जीत की बधाई दी। 'विक्ट्री स्पीच' में ओबामा भी रोमनी का आभार जताने से नहीं चुके। इन बड़े नेताओं को करोड़ो लोग उन्हें रोल मोडल के रूप में देखते हैं। एक रोल मोडल द्वारा सार्वजनिक जीवन में इस तरह व्यवहार करना आम नागरिक को काफी कुछ सिखाता बताता है।उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करता है। विश्व के शीर्षस्थ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह कह कर पूरी दुनिया को शिष्टाचार का पाठ पढ़ाया ।
मोदी की तरह नीतीश कुमार की भी लोकप्रियता अपने राज्य में कम नहीं है। उन्हें चाहनेवालों की संख्या भी करोड़ में है। बिहार की युवा पीढ़ी भी नीतीश को खूब जानती मानती है। उनकी सरकार के प्रचार से तो ऐसा ही लगता है कि उन्होंने ही लड़कियों को स्कूल जाना सिखाया। उन्हें साइकिल देकर उन्होंने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। लेकिन मोदी की जीत पर मोदी को बधाई न देकर नीतीश ने युवा पीढ़ी को कैसा शिष्टाचार सिखाया। चैनलवालों के माईक लगे रहे और नीतीश खामोश रहे। मोदी को मुबारकबाद न देकर उन्होंने खुद ही अपना कद छोटा कर लिया। मोदी को आम जनता ने चुना है। जनता के मत को हम नकार नहीं सकते। नीतीश ने बिहार की युवा पीढ़ी में ऐसा आचरण कर गलत संदेश दिया। राजनीति तो अपनी जगह है । वह तो चलती रहेगी। मगर राजनीति के साथ शिष्टाचार, आचरण, नैतिकता के मूल्यों का ह्रास न हो यह भी राज्य के मुखिया को ही सुनिश्चित करना होगा। भविष्य में सत्ता संभालने वाली भावी पीढ़ी को इस समय के नेताओं यही तो सिखाना है।
अपने स्वभाव के कारण और प्राय: सारपूर्ण बयान देनेवाले नीतीश ने बिहार को प्रगति के पटरी पर गति दी है। वे राष्ट्रीय स्तर के नेता बन चुके हैं। उनकी उपलब्धि की चौतरफा प्रसंशा है। नरेंद्र मोदी की तरह भावी प्रधानमंत्री के रूप में देश उन्हें भी देखना चाहता है।
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