Tuesday, 25 December 2012


रीति है बधाई देना

स्वस्थ ''राजनीति'' अब नहीं की जाती । यह स्वार्थ के लिए किया जाने लगा है। अब यह मूल्यों के लिए नहीं की जाती। नैतिकता की बात करना बेमानी है। इसमें बने रहने के लिए अब किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार होते हैं नेता। नैतिकता की बात भूल जाइए । आपमें फायदा दिखा तो आज आपके साथ और जिस क्षण पता चला कि आपसे मेरा स्वार्थ नहीं सध रहा तो नये समीकरण को अपनाने में कोई परहेज नहीं। मत कीजिए वसूलों की बातें ।
पिछले आम चुनाव के परिणाम आने के बाद यूपीए 2 बनने से पहले नीतीश ने कहा था कि जेडीयू उस सरकार का समर्थन करेगी जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने को तैयार होगा। मगर तब ऐसा कुछ हुआ नहीं। अब गुजरात चुनाव के परिणाम आने के बाद राजनीतिक पार्टियों के बीच नये समीकरण बनने लगे हैं। अगला चुनाव हो सकता है बीजेपी के साथ मिलकर जेडीयू न लड़े। बीजेपी के साथ दोस्ती निभाना शायद जेडीयू को अब घाटे का सौदा लगने लगा है। उसे नये साथी की तलाश है। कांग्रेस भी आरजेडी और एलजेपी से बेहतर जेडीयू से गठबंधन करने को फायदेमंद मानती है। इशारों में ही कांग्रेस ने जेडीयू को घास डाल दिये हैं। जेडीयू को संकेत मिल गया है ।यानी सत्ता पाने के लिए पार्टियों को अगले आम चुनाव में नये साथियों की तलाश होगी ! यानि स्वार्थ की राजनीति । देश हित की बात बाद में की जाएगी जब समय निकाल पायेंगे तब।

गुजरात में मदिरा पर निषेध है। यानी वहां मर्दों का पीना और फिर पीकर बवाल करने, अपनी स्त्री को पीटने घर में बच्चों का खयाल नहीं रखने जैसी घटनाओं के घटित होने का सवाल ही नहीं उठता । मदिरा जिससे करोड़ों का राजस्व प्राप्त होने की बात नीतीश कुमार किया करते हैं उन करोड़ों रूपयों की मोदी को परवाह नहीं। फिर भी मोदी का राज्य देश के अति विकसित राज्यों में से एक है। दूसरी तरफ मदिरा ने पिछले दिनों बिहार में सैकड़ा से भी ज्यादा लोगों की जान ले ली। शराब से कितने ही परिवार बरबाद हो रहे हैं मगर इसके बिक्री की वकालत की जा रही है। कारण इससे करोड़ों का राजस्व राज्य को प्राप्त हो रहा है। जिम्मेदार नेताओं से यह भी सुनने को मिला कि इससे प्राप्त हो रहे राजस्व से लड़कियों के स्कूल जाने के लिए साइकिल तक खरीदे जा रहे हैं। बताइए एक तरफ जहरीला शराब पीकर परिवार के मुखिया की मौत हो जा रही है , परिवार सड़क पर आ जा रहा है और दूसरी तरफ मदिरा से करोड़ों का राजस्व प्राप्त होने के कारण इसे और भी बढ़ावा दिया जा रहा है । नीतीश जी को राजस्व कमाने का कोई और विकल्प ढूंढ़ना होगा। मौत देकर राजस्व कमाना किसी को स्वीकार्य नहीं। सख्ती बरतनी होगी। बढ़ती शराब दुकानों की संख्या पर अंकुश लगाना ही होगा। इसका नौजवानों की जिंदगी पर असर पड़ रहा है। जानना होगा और अनुसरण करना होगा कि मदिरा पर निषेध लगाकर गुजरात राजस्व कैसे कमा रहा है। कैसे आगे बढ़ रहा है गुजरात। अनुसरण करने के रास्ते में अहम नहीं आना चाहिए।

जीत के बाद नरेंद्र मोदी का केशुभाई से जाकर मिलना उनका आशीर्वाद लेना उन्हें मिठाई खिलाना ... उनके हाथ से मिठाई खाना शिष्टाचार का हिस्सा है। य़ुवा वर्ग खासकर शहरों में जो मोदी को ही जानता है, जिनके वोट मोदी को ही मिले उन्हें मोदी ने अपने इस व्यवहार से शिष्टाचार का एक पाठ पढ़ा दिया। जीत के बाद भी विनम्रता बनी रहे मोदी ने देश की भावी पीढ़ी को सिखाया । साथ ही मोदी ने अपने इस व्यवहार से उनलोगों का समर्थन दोबारा पाने का प्रयास किया जो उनसे इस समय दूर हैं। आनेवाले समय में केशुभाई एक बार फिर मोदी के साथ हो लें तो इसमें ताज्जुब करने की जरूरत नहीं। इसे मोदी के रचनात्मक राजनीति की संज्ञा देनी होगी।

अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में हार के बाद भी शिष्टाचार को न भूलते हुए टिम रोमनी ने बराक ओबामा को उन्हें जीत की बधाई दी। 'विक्ट्री स्पीच' में ओबामा भी रोमनी का आभार जताने से नहीं चुके। इन बड़े नेताओं को करोड़ो लोग उन्हें रोल मोडल के रूप में देखते हैं। एक रोल मोडल द्वारा सार्वजनिक जीवन में इस तरह व्यवहार करना आम नागरिक को काफी कुछ सिखाता बताता है।उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करता है। विश्व के शीर्षस्थ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह कह कर पूरी दुनिया को शिष्टाचार का पाठ पढ़ाया ।

मोदी की तरह नीतीश कुमार की भी लोकप्रियता अपने राज्य में कम नहीं है। उन्हें चाहनेवालों की संख्या भी करोड़ में है। बिहार की युवा पीढ़ी भी नीतीश को खूब जानती मानती है। उनकी सरकार के प्रचार से तो ऐसा ही लगता है कि उन्होंने ही लड़कियों को स्कूल जाना सिखाया। उन्हें साइकिल देकर उन्होंने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। लेकिन मोदी की जीत पर मोदी को बधाई न देकर नीतीश ने युवा पीढ़ी को कैसा शिष्टाचार सिखाया। चैनलवालों के माईक लगे रहे और नीतीश खामोश रहे। मोदी को मुबारकबाद न देकर उन्होंने खुद ही अपना कद छोटा कर लिया। मोदी को आम जनता ने चुना है। जनता के मत को हम नकार नहीं सकते। नीतीश ने बिहार की युवा पीढ़ी में ऐसा आचरण कर गलत संदेश दिया। राजनीति तो अपनी जगह है । वह तो चलती रहेगी। मगर राजनीति के साथ शिष्टाचार, आचरण, नैतिकता के मूल्यों का ह्रास न हो यह भी राज्य के मुखिया को ही सुनिश्चित करना होगा। भविष्य में सत्ता संभालने वाली भावी पीढ़ी को इस समय के नेताओं यही तो सिखाना है। 

अपने स्वभाव के कारण और प्राय: सारपूर्ण बयान देनेवाले नीतीश ने बिहार को प्रगति के पटरी पर गति दी है। वे राष्ट्रीय स्तर के नेता बन चुके हैं। उनकी उपलब्धि की चौतरफा प्रसंशा है। नरेंद्र मोदी की तरह भावी प्रधानमंत्री के रूप में देश उन्हें भी देखना चाहता है।
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11 comments:

  1. विभिन्न समाचारों पर आपकी सटीक दृष्टि प्रशंसनीय है... मोदी के शिष्टाचार... विनम्रता तथा सकारात्मक राजनीतिक दृष्टिकोण... वर्तमान एवम् भविष्य के युवाओं के लिए एक आदर्श अवश्य है... इसके अतिरिक्त गुजरात में नरेन्द्र मोदी की विजय पर नीतिश कुमार की चुप्पी सर्वथा अनुचित है... जनमत का स्वागत् न करना... अनपेक्षित परिणामों के प्रभाव को परिलक्षित करता है... अथवा क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के कारण संभलकर राजनीतिक बर्ताव कर रहे हैं... किन्तु संभवत: यह लोकतंत्र की अवमानना की भाँति परिलक्षित हो रहा है... समाचारों की आपकी समीक्षा सटीकता के समकक्ष है... इन विषयों पर विचार - मनन हेतु धन्यवाद... आपका राजेश ध्यानी...

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  2. नीतीश के बधाई ना देने के पीछे दो वजहें हो सकती हैं....पहला ये कि नेता सिर्फ लेता है देता नहीं...और शायद इसी मंशा के साथ नीतीश ने भी बधाई देना उचित नहीं समझा...और दूसरा उनकी अपरिपक्व राजनीतिक समझ, जो शायद ये संकेत देती है कि मोदी का कद बढ़ने से उनका कद छोटा हो जाएगा....लेकिन वो ये भूल गए कि एक अच्छा नेता वो है जो अच्छे पर भी अच्छा बोले और बुरे पर भी अच्छा...

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  3. priya sanjay... bahut dino baad aapka likha koi piece padhne ka muka milaa.... bahut achchha lagaa. neetish aur modi dono vikaas ke daave ke liye jaane jaate hain... dono ki alag-alag raajneeti hai. dambh bhee dono me se kisee me kam nahi hai... pr sahmat hoon... modi use vyakt karne ke maamle me nitish ke mukaable jyada paripakva hain. baharhaal... apna vishleshan hamse saajha karte rahen... dhanyavaad

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  4. Good to see you in thus forum. Keep spreading your ideas and reflections. Greetings from Odisha.

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  5. ऐसा लिखिए तो अखबार के एडिटर को जरूर मेल कीजिए...बहुत बढ़िया है...कॉन्टेंट वाइज काफी रीच है.....best of luck
    sunil pandey

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  6. Priya Sanjay ji,
    Sab se pehle aur sabse achi baat ye hai ki saal ke jaate jaate aapne hum me se sirf aapne likhne ki shurivat kardi. Likhna padhna hi hamara pesha hi nahin, hamara kartavya bhi hai.Iske liye aapko bahut bahut badhai. Ab saahas karte hain, aapke lekh par,tippani karne ki , par tippani karne se pehle, apne anubhav ke aadhar par kuch kehne ki anumati chahunga. Likhe hue shabdon ka vishesh mahatva hai.Vay hamare paksh ya vipaksh ka dastavezi sabut hote hai.Shabdo se bane vaakyon aur vaakyon me kahi gayi baatein, vichaar hoti hain ya to pratikriya hoti hain.Naa likhne padhne ki aadat ne humse vichaar cheen liye hain.Ab hum sirf pratikriya dete hain.Main jaanta hu ki aapke andar bahut se vichaar hulchul machaate rehte hain. Lekin poori vinamrata aur sammaan ke saath kehna chahunga ki aap ke lekh me aapke vichaar pratikriya ban kar hi shabdon mein utre hain. Ye sahi hai ki Gujrat- Modi, Nitish- Bihar, JDU-Congress- BJP humein vichaar nahi de sakte. Uske liye humein gehre paithna padega.Filhaal,itna to vishwas ho hi gaya hai ki aapne aapne aas paas ko padhne ke liye zameen aur likhne ke aakash bicha diya hai.

    Dhrishtata ke liye chama karengey.
    Aapka
    Vinod Srivastava.

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  7. बात सिर्फ राजनीतिक शिष्टाचार की होती तो शायद नीतीश कुमार निभा भी ले जाते, लेकिन तथाकथित धर्म निरपेक्षता की जंजीर से वे भी उसी तरह जकड़े हुए हैं, जैसे कि दूसरे कई नेता..... वोट बैंक के नाराज होने का खतरा ही वो एकमात्र कारण है जो नीतीश को 'राज (नीति) धर्म' का पालन करने से रोके हुए है.... उन्हें सिर्फ मोदी से परहेज है, बीजेपी से नहीं...क्यों? .....दूसरी बात, मुझे लगता है, संजय... बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का मुद्दा ही वो अकेला ऐसा दरवाजा है, जो नीतीश कुमार ने अभी तक खोले रखा है.... इस मुद्दे पर वो चुनाव के बाद बीजेपी या N D A से सौदा कर सकते हैं..... और शायद इसी बहाने मोदी के रस्ते से हट जाएँ....??

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  8. Gunjan Sinha on my first post in Facebook (Experienced comment process in BLOG a bit complicated)


    संजय जी, आपका ब्लॉग देखा। बधाई ! लेकिन उस पर कोई कमेन्ट पोस्ट करने में असफल रहा। अतः यहाँ लिख रहा हूँ। - आपने नीतीश जी पर जो लिखा है उस बारे में - नीतीश से ज्यादा उम्मीद करना बेकार है। वे बिहार में कोई क्रान्ति नहीं कर सकते और इसके लिए वे ही नहीं बिहार के लोग भी जिम्मेवार हैं। पहली बात तो यही है कि बिहार के लोग गुजराती नहीं हैं जो स्वभाव से ही उद्यमी हों। जड़ सामंती मानसिकता सिर्फ नेता में ही नहीं है, हम सब में है। बिहार में आबादी बढ़ने की जो रफ़्तार है उसमे कोई भी सी एम कुछ नहीं कर सकता जबतक वह जनसँख्या पर नियंत्रण न करे और यह कर पाने की क्षमता तो दूर, सोच भी बिहार के नेताओं में नहीं है। नीतीश ने एक ही ऐतिहासिक काम किया - महिलाओं के लिए स्थानीय निकायों में 50% आरक्षण। इसके नतीजे 20 साल बाद आयेंगे। दूसरा काम- भूमि सुधार- करने की हिम्मत वे नहीं जुटा सके। तीसरा हो सकता था औद्योगीकरण। नहीं हो सका। चौथा था बिहार में उच्च शिक्षा के केंद्र विकसित कर छात्रों और उनके साथ बाहर जाने वाले धन को रोकना - नहीं कर सके। निजी या सरकारी विश्व विद्यालय खुल नहीं सके। 6 साल पहले घोषणा हुई कि महिला विश्व विद्यालय खुलेगा। लेकिन हज़ारों घोषणाओं की तरह हवा में रह गई। मैंने नीतीश और अर्जुन मुंडा दोनों को लिखित अर्जियां दी थीं कि राज्य की बसों में आंध्र प्रदेश की तरह 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करें ताकि भीड़ में उनकी दुर्गति न हो। इसमें सरकार का कोई खर्च भी नहीं था लेकिन कई लोगों से कहवाने के बावजूद दोनों यह ज़रूरी और छोटा सा काम नहीं कर सके। जबतक कोई समाज अपनी महिलाओं को सुरक्षा, सुविधा, आज़ादी और सम्मान नहीं दे सकता वह तबतक जाहिल ही रहेगा। राज्य में सड़कें, बिजली, शिक्षा, बिल्डिंग सब ज़रूरी है लेकिन राज्य सरंजाम से नहीं बनता - बनता है लोगों से। लोगों को बनाती है शिक्षा और उसमे सबसे बुरा हाल है। मीडिया विनम्र है। पहले बिहार की मीडिया आक्रामकता के लिए देश में जानी जाती थी - अब यह अपनी विनम्रता के लिए चर्चित है। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो - ये इसके आदर्श हैं। मीडिया का काम विकास करना नहीं है। मीडिया का काम मीठा बोलना नहीं है। साबुन अगर मैल काटने के बदले चिकनाई लगाने लगे तो हो चुकी सफाई। हम तो सफाईकर्मी हैं, सोफे पर बैठने के लिए नहीं हैं। कल फेसबुक पर एक फोटो में देखा कैसे पत्रकार गिफ्ट लेने के लिए भिखमंगों की तरह लाइन लगा कर अर्जुन मुंडा के अहाते में खड़े हैं। मुझे उलटी आने लगी। इस रीढविहीन ज़मात से आप पत्रकारिता की उम्मीद करेंगे? नव-निर्माण के लिए विध्वंश का एक नाद बर्दाश्त कर पाएगी यह नपुंसक भीड़? पत्रकार पालतू नहीं होता - वह जंगली चीता होता है। पत्रकार में सिर्फ दो चीजें ज़रूरी हैं - आग और पानी। दिल में आग - आँख में पानी। पटना रांची में आग बुझ गई है - पानी मर गया है।

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  10. ise parhne ke baad man khush ho gayas sir aur jaha tak tarif ki baat hai to aapki jitni tarif ki jaye kam hogi

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