अहा ! मेरी सरजमीं पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट !
पांच ..... सात साल की उम्र में 40 बरस पहले ऐसी कल्पना भी नहीं थी कि एक दिन रांची में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेला जाएगा। वह भी भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान रांची का ही होगा। माही जहां पले बढ़े हैं उसी शहर का मैं भी हूं। माही खेल रहे थे 80 के दशक में और हमसब की पीढ़ी 70 के दशक में खेल चुकी थी। माही ने जब होश संभाला होगा तब तेंदुलकर का पदार्पण हो चुका था और इधर 70 के दशक में गावस्कर धूम मचा रहे थे। वह जमाना सोलकर, विश्वनाथ,इंजीनियर, बेदी, चंद्रशेखर, प्रसन्ना का था । तब का समय गार्नर,होल्डिंग, लॉयड, रिचर्ड्स, विलिस,माईक डेनीस,एलन नॉट,थॉम्पसन,लिली,चैपल,टर्नर,क्रो और हेडली जैसे महान क्रिकेटरों का था ।
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| इंग्लैंड टीम के कप्तान एलस्टेयर कूक |
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| भारतीय टीम के कप्तान महेंद्रसिंह धोनी |
उस समय रांची जिला क्रिकेट का प्रतिनिधित्व शौकत हामिद, आलोक मित्रा, देवल सहाय, श्यामल रॉय जैसे खिलाड़ी किया करते थे। डिस्ट्रिक्ट मैच रांची-धनबाद, रांची-पटना के बीच पुलिस लाईन मैदान में खेले जाते थे। आलोक मित्रा तेज गेंदबाजों में से एक थे। कई बार जोर-शोर से चर्चा सुनने को मिलती थी कि इंडियन टेस्ट टीम में उनका सेलेक्शन बस होने ही को है। श्यामल रॉय भी एक प्रतिभाशाली वामहस्त बल्लेबाज थे। रमेश सक्सेना (टाटा), दलजीत सिंह (टाटा) भी काफी चर्चित खिलाड़ी थे।
ये सारे खिलाड़ी क्रिकेट के लिए उपयुक्त पुलिस लाईन , आरसीसी और मेकॉन के मैदानों में खेला करते थे। इन मैदानों के अतिरिक्त भी कई मैदान हुआ करते थे जिनमें प्राय: हर रविवार को क्रिकेट मैच गम्भीरता से खेले जाते थे। टीव्ही टॉवर की जगह एक शानदार मैदान हुआ करता था। पुलिस लाईन के मुख्य मैदान से सटे दो-तीन मैदान थे। बीएमपी ग्राउंड, वेलफेयर सिनेमा के पीछे, धुर्वा, चुटिया,लालपुर कोकर अरविंद स्पोर्टिंग पिस्कामोड़ हर तरफ मैदान थे और हर रविवार को मैच खेले जाते थे।
ऐसे माहौल में हमारी पीढ़ी का अछूता बने रहना मुमकिन नहीं था। सात-आठ साल की उम्र में हम क्रिकेट खेलने लगे थे। क्रिकेट के साथ दीवानगी तो इस हद तक हो गई थी कि क्रिकेट के अलावा जीवन में कुछ सूझता ही नहीं था । जब बैट-बॉल हाथों में नहीं होता था तो हम दिमागी क्रिकेट खेल रहे होते थे। सोचते कि उस गेंद को हम स्ट्रेट बैट क्यों नहीं खेले, फार्वड जाने के बजाय गेंद को बैकफूट पर क्यों खेले और जहां रन नहीं था वहां क्यों दौड़े रन आउट होने के लिए। वैसे कवर में लगाये गये तीन चौके शानदार रहे। ऐसे ही बल्लेबाज को स्ट्रोक खेलने के लिए हम कमजोर गेंद क्यों फेंकते गये और जब पिछला बल्लेबाज आक्रामक हो रहा था तब उसे यॉर्कर के जरिए कैसे बोल्ड कर दिया था। वाकई साथी खिलाड़ी ने स्लीप में अच्छे कैच लपके।
विदेश, देश और जिला स्तर के क्रिकेटरों के खेल की कमेंट्री रेडियो पर सुन, पत्रिकाओं में पढ़ और जिला स्तर के क्रिकेटरों के मैच देख हम मुहल्लेवाले भी टीम बनाकर रोज मैच खेला करते थे। इस मुहल्ला क्रिकेट में रोचकता यही थी कि हर खिलाड़ी प्राय: ऑलराउंडर हुआ करता था । हर लड़का खुद को गावस्कर,सोलकर,आबिद अली, करसन घावरी,चंद्रशेखर,प्रसन्ना,बेदी, फारूख इंजीनियर से कम नहीं समझता था। उन दिनों बॉम्बे के क्रिकेटरों का इतना वर्चस्व था कि, किशोर नाम का हमारा विकेटकीपर स्कोर-शीट में अपना नाम किशोलकर लिखवाया करता था।
क्रिकेट की दीवनगी तो इस हद तक थी कि घर में, रास्ते में और फुर्सत के हर पल में दिमाग में क्रिकेट ही चलता रहता था। शैडो बैटिंग और शैडो बाउलिंग खूब किया करते थे। तब हम बम्बई और दिल्ली जाकर क्रिकेट में नाम कमाने की महत्त्वाकांक्षा रखते थे।
उस महत्त्वकांक्षा को रांची के लाल माही ........ हां धोनी ने पूरा कर दिया है। माही मुंबई और दिल्ली से क्रिकेट को निकालकर रांची लेकर आ गये हैं।
रांची में एकदिवसीय मैच को लेकर नौजवानों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। आईआईएम के लड़के-लड़कियों ने रोड शो किया।180 करोड़ की लागत से बने इस स्टेडियम में खिलाड़ियों के लिए हर सुख-सुविधा उपलब्ध है। स्टेडियम में जिम के अलावा टेनिस,बॉस्केटबॉल कोर्ट और स्वीमिंग पुल भी है। मैच का आनंद35 हजार लोग ले सकते हैं। क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय मापदंड को पूरा करते इस मैदान में बल्लेबाज को चौका या छक्का के लिए गेंद को पूरे 75 गज दूर धकेलना होगा। इस डे-नाईट मैच को देखने के लिए स्टेडियम के अंदर दर्शक 37 भिन्न गेट से जा सकते हैं। देश भर के स्टेडियमों में से रांची का यह स्टेडियम भी किसी भी लिहाज से कम नहीं।
पीढ़ी दर पीढ़ी क्रिकेट को जुनून की तरह खेलते रहने का ही यह नतीजा है कि आज भारत और इंग्लैंड के बीच एक मैच रांची में खेला जाएगा।
रांची को विश्व प्रसिद्ध बनाने और रांची में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को लेकर आने का श्रेय महेंद्र सिंह धोनी को ही देना होगा। झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन को धोनी ने अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग कर अपनी जन्मस्थली रांची के प्रति ऋण उतारने का प्रयास किया है। धोनी के इस सपने को पूरा करने में झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष अमिताभ चौधरी जी जान से लगे रहे। शुरुआत में फुटबॉल और बैडमिंटन की तरफ रुझान रखनेवाले धोनी जब इंग्लैंड के कप्तान के साथ पिच पर जाएंगे टॉस करने के लिए तब रांचीवासी उनका हौसला अफजाई कर रहे होंगे। एक सुर में धोनी......धोनी......धोनी की आवाज गुंजायमान होगी । वातावरण में बिजली दौड़ रही होगी और हम रांचीवासी वह सबकुछ प्रत्यक्षरूप से देखने के भागी बनेंगे जो अबतक टीव्ही पर देखा , रेडियो पर सुना और अखबारों में पढ़ा करते थे । भले ही सिर्फ टीव्ही पर, लेकिन स्टेडियम की उस कानफाड़ू आवाज को सुनने को मैं बेताब हूं ।


बेहतरीन संजय.... पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे मेरा ही बचपन बयांहो रहा है.... मुझे लगता है 70 के दशक में बड़े हुए प्रायः हर शख्स को ऐसा ही लगेगा पढ़कर... बढ़िया पीस...
ReplyDeleteसंजय जी..शानदार लेख के लिये बधाई. आप ने जो लिखा उससे पुराने दिनों की यादें सजीव हो उठीं. हम भी बचपन से ही क्रिकेट के बड़े प्रशंसक रहे हैं. सारे काम-धाम और पढ़ाई-लिखाई छोड़कर क्रिकेट खेलने के लिये मैदान में दौड़े चले जाते थे. मुझे याद है 1987 का रिलायंस वर्ल्ड कप, जिसके मैचों की कमेंट्री सुनने के लिये हम लोग अपने स्कूल बैग में रेडियो छिपाकर ले जाते थे. आपके लेख को पढ़कर बचपन की वो अविस्मरणीय यादें फिर ताजा हो गयीं. दरअसल हमारे देश में हर दूसरे बच्चे का बचपन क्रिकेट खेलते और देखते ही आगे बढ़ता है. आगे चलकर उसकी लाइन भले ही बदल जाये, लेकिन वो यादें ताजा रहती हैं. आपने उन यादों को फिर से ताजा कर दिया.
ReplyDeleteआपको शानदार लेख के लिये फिर से बधाई...साथ में शुभकामनाएं भी...